नर सुन रे मूढ गंवारा। राम भजन ततसारा।। टेक।। भजन बिन बैल बनेगा, शूकर श्वान शरीरं। कऊवा खर की देह धरैगा, मिटै न याह तकसीरं।। १।। कीट पतंग भवंग होत हे, गीदड जंबक जूंनी। बिना भजन जड़ बिरछ कीजिये, पद बिन काया सूंनी।। २। भक्ति बिना नर खर एक है, जिन हरि पद नहीं जान्या। पारब्रह्म की परख नहीं रे, नहीं रे, पूजि मूये पाषाना।। ३।। स्थावर जंगम में जगदीशं, व्यापक ब्रह्म बिनानी। निरालंब न्यारा नहीं दरसै, भुगतै चारों खानी।। ४ ।। तोल न मोल उजन नहीं आवै, अस्थिर आनंद रूपं। घट मठ महतत सेती न्यारा, सोहं सति सरूपं ।। ५ ।। बादल छांह ओस का पानी, तेरा यौह उनमाना। हाट पटण क्रितम सब झूठा, रिंचक सुख लिपटाना।। ६।। निराकार निरभै निरबानी,सुरति निरति निरतावै| आत्मराम अतीत पुरूष कूँ, गरीबदास यों पावै||७||
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