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Showing posts from May 7, 2020

हम अविगत से चलि आये

 हम अविगत से चलि आये। मेरा कोई भेद मर्म नहीं पाये।। टेक।। ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक होय दिखलाये। काशी नगर जंगल में डेरा, तहाँ जुलहे कूँ पाये।। १।। माता पिता मेरे कोई नाहीं, ना मेरे गृह दासी। जुलहा का सुत आन कहाया, जगत कराई हाँसी।। २।। धरनी गगन नहीं कुछ मेरे, सूझे अगम अपारा। सत सरूपी नाम साहिब का, सो है नाम हमारा।। ३।। अधर द्वीप नहीं गगन गुफा में, तहां निज बास हमारा। जोत सरूपी अलख निरंजन, जपते नाम हमारा।। ४।। चाम लोहू नहीं मेरे, हूँ सतनाम उपासी। तारन तरन अभै पद दाता, कहै कबीर अविनाशी।। ५।।

मो कूँ कहां ढूंढे रे बन्दे

मो कूँ कहां ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।। टेक।। ना तीरथ में ना मूरति में, ना एकान्त निवास में ना मन्दिर में ना मस्जिद में, ना काशी कैलाश में।। १।। ना मैं जप में ना मैं तप में, ना मैं व्रत उपवास में। ना मैं क्रिया कर्म में रहता, ना मै योग सन्यास में।। २।। नहीं प्राण में नहीं पिण्ड में, ना ब्रह्मण्ड आकाश में। ना मैं त्रिकुटि भँवर गुफा में, सब श्वासन के श्वास में।। ३ ।। खोजी होय तुरत मिल जाऊँ, एक पल ही की तलाश में। कहै कबीर सुनो भई भई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में।। ४ ।।

कबीर परमेश्वर और काल ब्रह्म की वार्ता

काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) ने कहा हे बड़े भाई! मैं आप को पिता तुल्य मानता हूँ। आप मुझे कुछ वरदान दो जिस कारण से मेरे लोक की कुछ त्रुटियाँ दूर हो जाएं। आप फिर भले ही नीचे के लोकों में चले जाना। मैंने कहा मांग क्या मांगता है। ब्रह्म काल ने कहा आप वचन बद्ध हो जाएं तब मांगूगा। मैंने कहा मैं वचन बद्ध होता हूँ मांग क्या मांगता है ? काल ब्रह्म ने कहा (1) तीन युगों (सत्ययुग, त्रैता, द्वापर युगों) में थोड़े जीव ले जाना। चौथे युग कलयुग में आप अधिक जीव मुक्त कराना। पिता जी ने मुझे शाप दे रखा है, एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों को नित्य खाने का यदि आप सर्व जीवों को एक ही युग में ले जाओगे तो मैं भूखा मर जाऊंगा। (2) मैं आप का रूप धारण कर सकू। (3) जो आत्मा आप के ज्ञान को समझ कर आप के भक्तिमार्ग को ग्रहण करके आजीवन साधना करेगा। वह आप के लोक में जाये। जिस आत्मा का नाम खण्ड हो जाए अर्थात वह आपके भक्तिमार्ग को त्याग कर मेरी भक्ति करने लगे तथा आप के मार्ग को स्वीकार ही नहीं करे वे सर्व प्राणी मेरे लोक में ही रहें। (4) त्रेता युग में मेरे अंश विष्णु अवतार रामचन्द्र की समुद्र पर पुल बनाने में सहायता करना...

Kabir Parmeshwar se kal bramn ka Vivad part 1

हे धर्मदास् काल ब्रह्म आहार करने के लिए तप्तशिला की ओर चला। तब मैंने उन सर्व प्राणियों से कहा देखिए वह आ रहा है काल ब्रह्म साकार है, जिसे आप निराकार कहा करते। तेजोमय शरीर छोटा माथा लम्बे दांत डरावनी सूरत है। हे प्राणियों! अब आप जाओ। इतना कहते ही सर्व प्राणी जो तप्तशिला पर उपस्थित थे आकाश में उड़ गए तथा धर्मराज के दरबार में आ गए। वहाँ से कर्माधार से स्वर्ग-नरक या किसी प्राणी के शरीर में भेज दिया जाता है। हे धर्मदास! जब काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) तप्त शिला के निकट आया। उस समय उसको मेरा स्वरूप मेरे उस पुत्र योगसन्तायन उर्फ योगजीत का दिखाई दिया जिस रूप में मैंने काल ब्रह्म को सतलोक से निष्काशित किया था तथा मुझे योगजीत जान कर क्रोधित होकर बोला हे योगजीत यहाँ मेरे लोक में मेरी आज्ञा के बिना किसलिए आया। आज मैं तुझे मारूंगा, तेरी जीवन लीला समाप्त करूंगा। तुने मुझे सत्यलोक से धक्के मार कर निकाला था। मैंने तेरे से बहुत विनय की थी सत्यलोक से न निकालने की परन्तु तूने एक नहीं सुनी थी। क्या आप पिता जी का (सत्यपुरूष का) कोई संदेश-आदेश लेकर आए हो वह मुझे बताइए तत्पश्चात् युद्ध के लिए तैयार हो ...
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