काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) ने कहा हे बड़े भाई! मैं आप को पिता तुल्य मानता हूँ। आप मुझे कुछ वरदान दो जिस कारण से मेरे लोक की कुछ त्रुटियाँ दूर हो जाएं। आप फिर भले ही नीचे के
लोकों में चले जाना। मैंने कहा मांग क्या मांगता है। ब्रह्म काल ने कहा आप वचन बद्ध हो जाएं तब मांगूगा। मैंने कहा मैं वचन बद्ध होता हूँ मांग क्या मांगता है ?
काल ब्रह्म ने कहा (1) तीन युगों (सत्ययुग, त्रैता, द्वापर युगों) में थोड़े जीव ले जाना। चौथे युग कलयुग में आप अधिक जीव मुक्त कराना। पिता जी ने मुझे शाप दे रखा है, एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों को नित्य खाने का यदि आप सर्व जीवों को एक ही युग में ले जाओगे तो मैं भूखा मर जाऊंगा। (2) मैं आप का रूप धारण कर सकू। (3) जो आत्मा आप के ज्ञान को समझ कर आप के भक्तिमार्ग को ग्रहण करके आजीवन साधना करेगा। वह आप के लोक में जाये। जिस आत्मा का नाम खण्ड हो जाए अर्थात वह आपके भक्तिमार्ग को त्याग कर मेरी भक्ति करने लगे तथा आप के मार्ग को स्वीकार ही नहीं करे वे सर्व प्राणी मेरे लोक में ही रहें। (4) त्रेता युग में मेरे अंश विष्णु अवतार रामचन्द्र की समुद्र पर पुल बनाने में सहायता करना (5) द्वापर में मेरा अंश कृष्ण रूप में जाएगा। वह एक जगन्नाथ नाम से मन्दिर बनवाना चाहेगा समुन्द्र उसे तोड़ेगा। आप उस मंदिर कि समुद्र से रक्षा करना। उपरोक्त वर मुझे प्रदान करके आप नीचे जाईए तथा पिता जी की आज्ञा का पालन किजिए। मैंने काल ब्रह्म से कहा हे ज्योति निरंजन! जो उपरोक्त वर आपने मांगे वे सर्व मैंने आपको दे दिये (तथा अस्तु) हे धर्मदास ! उस स्वार्थी ने तुरन्त मेरे पैर छोड़ दिए तथा कहा हे जोगजीत! आप किस नाम जाप से भक्ति कराओगे? वह मुझे बता दो ताकि मैं उन आत्माओं को सत्यलोक जाने दूँ जिनके पास आप का मन्त्र जाप होगा। मैं उनको छोड़ दूंगा। हे धर्मदास ! काल ने मेरे से छल करना चाहा कि सत्यनाम व सारनाम को जानकर वह अपने दूतों (संदेश वाहक गुरूओं) को बता देता। उनके द्वारा बताए गए इस सारनाम का साधक को कोई लाभ नहीं मिलता तथा जब मैं या मेरा अंश यही मन्त्र जाप देते तो सर्व प्राणी कहते यह तो हमारे गुरूर्व
हो। हे धर्मदास ! यह महा धोखा हो जाता। इस चालाकी को समझ गया हूँ। मैं तुझे वह सारनाम व सारज्ञान नहीं बताता जिसके पास हमारे द्वारा बताया सारनाम होगा उसके निकट तू नहीं जा सकेगा उसे तू नहीं रोक सकेगा वह तेरे
शीश पर पैर रखकर उस सारनाम की भक्ति की शक्ति से सत्यलोक चला जाएगा। हे धर्मदास! तब काल ब्रह्म ने हंसते हुए कहा हे सहज दास! (हे धर्मदास काल ब्रह्म को मैं भिन्न-2
रूप अपने पुत्रों के दिखा रहा था वह कभी मुझे योगजीत समझ रहा था कभी उसे लगता था शायद यह सहज दास है
कभी लगता था यह ज्ञानी है ये सर्व नाम उन 16 पुत्रों के हैं जो सत्यलोक सृष्टी की आदि में अपनी वचन शक्ति से
उत्पन्न किए थे। कृप्या पढ़ें सृष्टी रचना में) आप जाओ नीचे संसार में मैंने सर्व जीवों को लोकवेद पर आधारित कर रखा है। मैंने अपने ऋषियों व महर्षियों को शास्त्रों (वेदों) के विपरीत ज्ञान प्रदान कर रखा है वे कहते हैं कि हम वेदों अनुसार ज्ञान बता रहे हैं परन्तु उनका लोकवेद शास्त्रों के ज्ञान के विपरीत है। उन ऋषियों को महाज्ञानी मानकर अन्य प्रजा उन्हीं के ज्ञान पर अति दृढ़ होकर लगी है। वे कहते है कि पूर्ण परमात्मा की भक्ति करो। वही मोक्ष दायक है
लोकों में चले जाना। मैंने कहा मांग क्या मांगता है। ब्रह्म काल ने कहा आप वचन बद्ध हो जाएं तब मांगूगा। मैंने कहा मैं वचन बद्ध होता हूँ मांग क्या मांगता है ?
काल ब्रह्म ने कहा (1) तीन युगों (सत्ययुग, त्रैता, द्वापर युगों) में थोड़े जीव ले जाना। चौथे युग कलयुग में आप अधिक जीव मुक्त कराना। पिता जी ने मुझे शाप दे रखा है, एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों को नित्य खाने का यदि आप सर्व जीवों को एक ही युग में ले जाओगे तो मैं भूखा मर जाऊंगा। (2) मैं आप का रूप धारण कर सकू। (3) जो आत्मा आप के ज्ञान को समझ कर आप के भक्तिमार्ग को ग्रहण करके आजीवन साधना करेगा। वह आप के लोक में जाये। जिस आत्मा का नाम खण्ड हो जाए अर्थात वह आपके भक्तिमार्ग को त्याग कर मेरी भक्ति करने लगे तथा आप के मार्ग को स्वीकार ही नहीं करे वे सर्व प्राणी मेरे लोक में ही रहें। (4) त्रेता युग में मेरे अंश विष्णु अवतार रामचन्द्र की समुद्र पर पुल बनाने में सहायता करना (5) द्वापर में मेरा अंश कृष्ण रूप में जाएगा। वह एक जगन्नाथ नाम से मन्दिर बनवाना चाहेगा समुन्द्र उसे तोड़ेगा। आप उस मंदिर कि समुद्र से रक्षा करना। उपरोक्त वर मुझे प्रदान करके आप नीचे जाईए तथा पिता जी की आज्ञा का पालन किजिए। मैंने काल ब्रह्म से कहा हे ज्योति निरंजन! जो उपरोक्त वर आपने मांगे वे सर्व मैंने आपको दे दिये (तथा अस्तु) हे धर्मदास ! उस स्वार्थी ने तुरन्त मेरे पैर छोड़ दिए तथा कहा हे जोगजीत! आप किस नाम जाप से भक्ति कराओगे? वह मुझे बता दो ताकि मैं उन आत्माओं को सत्यलोक जाने दूँ जिनके पास आप का मन्त्र जाप होगा। मैं उनको छोड़ दूंगा। हे धर्मदास ! काल ने मेरे से छल करना चाहा कि सत्यनाम व सारनाम को जानकर वह अपने दूतों (संदेश वाहक गुरूओं) को बता देता। उनके द्वारा बताए गए इस सारनाम का साधक को कोई लाभ नहीं मिलता तथा जब मैं या मेरा अंश यही मन्त्र जाप देते तो सर्व प्राणी कहते यह तो हमारे गुरूर्व
हो। हे धर्मदास ! यह महा धोखा हो जाता। इस चालाकी को समझ गया हूँ। मैं तुझे वह सारनाम व सारज्ञान नहीं बताता जिसके पास हमारे द्वारा बताया सारनाम होगा उसके निकट तू नहीं जा सकेगा उसे तू नहीं रोक सकेगा वह तेरे
शीश पर पैर रखकर उस सारनाम की भक्ति की शक्ति से सत्यलोक चला जाएगा। हे धर्मदास! तब काल ब्रह्म ने हंसते हुए कहा हे सहज दास! (हे धर्मदास काल ब्रह्म को मैं भिन्न-2
रूप अपने पुत्रों के दिखा रहा था वह कभी मुझे योगजीत समझ रहा था कभी उसे लगता था शायद यह सहज दास है
कभी लगता था यह ज्ञानी है ये सर्व नाम उन 16 पुत्रों के हैं जो सत्यलोक सृष्टी की आदि में अपनी वचन शक्ति से
उत्पन्न किए थे। कृप्या पढ़ें सृष्टी रचना में) आप जाओ नीचे संसार में मैंने सर्व जीवों को लोकवेद पर आधारित कर रखा है। मैंने अपने ऋषियों व महर्षियों को शास्त्रों (वेदों) के विपरीत ज्ञान प्रदान कर रखा है वे कहते हैं कि हम वेदों अनुसार ज्ञान बता रहे हैं परन्तु उनका लोकवेद शास्त्रों के ज्ञान के विपरीत है। उन ऋषियों को महाज्ञानी मानकर अन्य प्रजा उन्हीं के ज्ञान पर अति दृढ़ होकर लगी है। वे कहते है कि पूर्ण परमात्मा की भक्ति करो। वही मोक्ष दायक है
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