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Kabir Parmeshwar se kal bramn ka Vivad part 1

हे धर्मदास् काल ब्रह्म आहार करने के लिए तप्तशिला की ओर चला। तब मैंने उन सर्व प्राणियों से कहा देखिए वह आ रहा है काल ब्रह्म साकार है, जिसे आप निराकार कहा करते।
तेजोमय शरीर छोटा माथा लम्बे दांत डरावनी सूरत है। हे प्राणियों! अब आप जाओ। इतना कहते
ही सर्व प्राणी जो तप्तशिला पर उपस्थित थे आकाश में उड़ गए तथा धर्मराज के दरबार में आ गए। वहाँ से कर्माधार से स्वर्ग-नरक या किसी प्राणी के शरीर में भेज दिया जाता है।
हे धर्मदास! जब काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) तप्त शिला के निकट आया। उस समय उसको मेरा स्वरूप मेरे उस पुत्र योगसन्तायन उर्फ योगजीत का दिखाई दिया जिस रूप में मैंने काल ब्रह्म को सतलोक से निष्काशित किया था तथा मुझे योगजीत जान कर क्रोधित होकर बोला हे योगजीत यहाँ मेरे लोक में मेरी आज्ञा के बिना किसलिए आया। आज मैं तुझे मारूंगा, तेरी जीवन लीला समाप्त करूंगा। तुने मुझे सत्यलोक से धक्के मार कर निकाला था। मैंने तेरे से बहुत विनय की थी सत्यलोक से न निकालने की परन्तु तूने एक नहीं सुनी थी। क्या आप पिता जी का (सत्यपुरूष का) कोई संदेश-आदेश लेकर आए हो वह मुझे बताइए तत्पश्चात् युद्ध के लिए तैयार हो जाइए। (मैंने जान लिया था धर्मदास कि यह मुझे योगजीत समझ रहा है इसलिए मैंने योगजीत की भूमिका करते हुए ये शब्द कहे) मैंने कहा हे काल निरंजन! मुझे पिता जी अर्थात् सत्यपुरूष ने भेजा है। तेरे लोक में
सर्व आत्माएँ महाकष्ट उठा रही हैं। उनकी पुकार परमेश्वर ने सुन ली है। अब मैं तेरे नीचे के ब्रह्मण्डों में जाऊंगा। तेरे द्वारा बताए गए लोक वेद (व्यर्थ ज्ञान) का पर्दा फाश करूंगा तथा
तत्वज्ञान द्वारा सर्व प्राणियों को पूर्ण परमात्मा का ज्ञान कराके सत्य साधना प्राप्त कराऊंगा। जिससे सर्व प्राणी मानव शरीर धारी सत्य साधना करके अपने पूर्व वाले स्थान सत्यलोक में चले जाएंगे।
हे धर्मदास! मेरी बातें सुन कर काल ब्रह्म अत्यन्त क्रोधित हो गया तथा मुझे समाप्त करने के उद्देश्य से मेरे ऊपर आक्रमण किया। मैंने सतनाम का सुमरण किया जिसके प्रभाव से काल ब्रह्म नीचे पाताल लोक में गिर गया। भयभीत होकर कांपने लगा उसकी स्थिति ऐसी हो गई जैसे पक्षी के पंख कट जाते हैं वह एक स्थान पर गिरा फड़फड़ाता है परन्तु उड़ नहीं पाता। मैं भी उसके साथ पाताल लोक में पहुँच गया। काल ब्रह्म ने जान लिया कि योगजीत के पास शक्तिशाली सिद्धि है ये मेरे से मारा नहीं जा सकता। तब उस (काल ब्रह्म) ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने की अन्य युक्ति सोची। उसने कहा हे योगजीत आप मेरे बड़े भाई हो मैं आप का छोटा भाई हूँ। छोटे तो उत्पात ही किया करते हैं परन्तु बड़ों का बडप्पन क्षमा करने में ही होता है। मुझे क्षमा करो यह कहते हुए काल ब्रह्म घिसड़ता हुआ मेरे अति निकट आया तथा मेरे चरण पकड़ कर गिड़गड़ाने लगा। मैं उसको लेकर फिर इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में तप्त शिला के पास ले आया। मैंने कहा हे काल निरंजन ! मैंने तुझे क्षमा कर दिया मेरे पैर छोड़ मैंने नीचे के लोकों में जाना है तथा सर्व आत्माओं को तेरे जाल से मुक्त कराना है।

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