हम अविगत से चलि आये। मेरा कोई भेद मर्म नहीं पाये।। टेक।।
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक होय दिखलाये।
काशी नगर जंगल में डेरा, तहाँ जुलहे कूँ पाये।। १।।
माता पिता मेरे कोई नाहीं, ना मेरे गृह दासी।
जुलहा का सुत आन कहाया, जगत कराई हाँसी।। २।।
धरनी गगन नहीं कुछ मेरे, सूझे अगम अपारा।
सत सरूपी नाम साहिब का, सो है नाम हमारा।। ३।।
अधर द्वीप नहीं गगन गुफा में, तहां निज बास हमारा।
जोत सरूपी अलख निरंजन, जपते नाम हमारा।। ४।।
चाम लोहू नहीं मेरे, हूँ सतनाम उपासी।
तारन तरन अभै पद दाता, कहै कबीर अविनाशी।। ५।।
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक होय दिखलाये।
काशी नगर जंगल में डेरा, तहाँ जुलहे कूँ पाये।। १।।
माता पिता मेरे कोई नाहीं, ना मेरे गृह दासी।
जुलहा का सुत आन कहाया, जगत कराई हाँसी।। २।।
धरनी गगन नहीं कुछ मेरे, सूझे अगम अपारा।
सत सरूपी नाम साहिब का, सो है नाम हमारा।। ३।।
अधर द्वीप नहीं गगन गुफा में, तहां निज बास हमारा।
जोत सरूपी अलख निरंजन, जपते नाम हमारा।। ४।।
चाम लोहू नहीं मेरे, हूँ सतनाम उपासी।
तारन तरन अभै पद दाता, कहै कबीर अविनाशी।। ५।।
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