Skip to main content

सती #सीता के साथ अन्याय हुआ, उस #पाप का दण्ड दिया जो उसने किया ही नहीं!

राजा राम 
लंका का राज विभिषण को देकर सीता जी अग्नि परीक्षा लेने के बाद अयोध्या आने पर घर-घर दीप जलाया। कुछ समय पश्चात रामचंद्र जी #अयोध्या की गलियों में भेष बदल कर विचरण कर रहे थे। एक घर से ऊँची-ऊँची आवाज आ रही थी। राजा रामचन्द्र जी ने निकट जाकर वार्ता सुनी। एक #धोबी की पत्नी झगड़ा करके घर से चली गई थी। वह दो-तीन दिन अपने बहन के घर रही, फिर लौट आई। धोबी उसकी पिटाई कर रहा था। कह रहा था कि निकल जा मेरे घर से, तू दो रात बाहर रहकर आई है। मैं तेरे को घर में नहीं रखूँगा।तू कलंकित है। वह कह रही थी, मुझे सौगंध भगवान की। सौगंध है राजा राम की, मैं पाक साफ हूँ। आपने मारा तो मैं गुस्से से अपनी बहन के घर गई थी, मैं निर्दोष हूँ।धोबी ने कहा कि मैं दशरथ पुत्र रामचन्द्र नहीं हूँ जो अपनी कलंकित पत्नी को घर ले आया है जो वर्षों #रावण के साथ रही थी। अयोध्या नगरी के सब लोग-लुगाई चर्चा कर रहे हैं। क्या जीना है ऐसे व्यक्ति का जिसकी पत्नी अपवित्र हो गई हो। राजा राम ने धोबी के मुख से यह बात सुनी तो कानों में मानो गर्म तेल डाल दिया हो।अगले दिन रामचन्द्र जी ने #सभा बुलाई तथा नगरी में चल रही चर्चा के विषय में बताया और कहा कि यह चर्चा तब बंद हो सकती है, जब मैं #सीता को घर से निकाल दूँगा। उसी समय सीता
जी को सभा में बुलाया गया तथा घर से निकलने का आदेश दे दिया। कारण भी बता दिया। सीता जी ने विनय भी की कि हे स्वामी! आपने मेरी अग्नि परीक्षा भी ली थी। मैं भी आत्मा से कहती हूँ, रावण के मेरे साथ कोई संबंध नहीं है । कारण था कि उसको एक #ऋषि का शॉप था कि यदि तू किसी परस्त्री से बलात्कार करेगा तो तेरी उसी समय मृत्यु हो जाएगी। यदि परस्त्री की सहमति से मिलन करेगा तो ऐसा नहीं होगा। जिस कारण से रावण मुझे छू भी नहीं सका मिलन के लिए।
हे प्रभु! मैं अभी #गर्भवती हूँ। ऐसी स्थिति में कहाँ जाऊँगी? रावण जैसे व्यक्तियों का अभाव नहीं है। रामचन्द्र जी आदेश देकर सभा छोड़कर चले गए। कहते गए कि मैं #निंदा का पात्र नहीं बनना चाहता। मेरे कुल को दाग लगेगा। सीता जी को धरती भी #पैरों से खिसकती नजर आई।
आसमान में अँधेरा छाया दिखाई दिया। संसार में कुछ दिनों का जीवन शेष लगा।
सीता #अयोध्या की सीमा से दूर जंगल में भटकती हुई जाकर ऋषि #वाल्मिकि जी की कुटिया के निकट थककर गिर गई, अचेत हो गई।

ऋषि वाल्मिकि स्नान करने के लिए आश्रम से निकले। सामने एक युवती
#गर्भावस्था में अचेत पड़ी देखकर निकट गए। अपने आश्रम से औषधि लाए। सीता जी के मुख में डाली। गर्मी का मौसम था। ठण्डे जल के छींटे मुख पर मारे। उसी समय सीता जी सचेत होकर बैठ गई। ऋषि ने नाम और गाँव पूछा तो बताया कि नीचे पृथ्वी, ऊपर #आसमान, आगे कुछ बताने से इंकार कर दिया। ऋषि दयावान होते हैं।
कहा, बेटी संसार तो #स्वार्थ का है। धन्यवाद कर परमात्मा का, तू मेरे आश्रम में आ गई। बेटी मुझे अपना पिता मान और मेरे पास रह। सीता जी ऋषि वाल्मिकि जी के आश्रम में रहने लगी।

झूठी कुल मर्यादा के नाम पर राम का निष्पाप #सतित्व माता सीता का त्याग किया, उसी तरह उनका अनुसरण जनता करने लगे तो कितना अनर्थ हो जाता है।यह मर्यादित निर्णय नहीं था। रामायण का यह प्रकरण जब आता है तो दिमाग में हथोड़े की चोट लगती है, जो सीता उनके बिना एक पल भी जीना उचित नहीं समझती। 12 साल भूखी प्यासी अपने राम की याद में रावण की कैद झेलने के बाद भी रोती रही, #परपुरुष की तरफ देखा तक नहीं, उसे किस पाप की सजा सुनाई? क्षत्रिय कुल की मर्यादा के नाम पर ? जनता का मुँह बंद हो गया?
सती सीता के साथ अन्याय हुआ, उस #पाप का दण्ड दिया जो उसने किया ही नहीं! न जाने सीता माता जैसी कितनी माताओं के साथ अन्याय त्रेता युग से होता आया है, और पुरुष प्रधान समाज में कितनी पीङा झेल रही है यह तो एक स्त्री ही समझ सकती है ? जन्म-जन्म का साथ है, सुख दुख का साथी, अर्धांगनी जैसे शब्दों के स्थान पर हर रोज गंदगी फैलाते टीवी चैनल औरतों के साथ बलात्कार की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करने वाले न्यूज पेपर हमें कहाँ ले जा रहे हैं? न जाने कितनी माताओं के साथ अन्याय की फाइलें उनके साथ ही हमेशा के लिए बंद कर दी ।

श्रीराम से ऊपर कोई #खलनायक जैसी शक्ति है जो इन प्रभुओं को भी कठपुतली की तरह नचाती है और केवल #प्रारब्ध का फल देती है।

आदिराम ही सर्व सुखदाता तथा पूर्ण मोक्ष दाता है उसका वेदों में नाम कविर्देव है। उनकी शरण में आए बिना #दुखों का अंत नहीं हो सकता।

Comments

Popular posts from this blog

सृष्टि रचना कबीर साहेब की अमृतवाणी

धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।। यहि कारन मैं कथा पसारा। जगसे कहियो राम नियारा।। यही ज्ञान जग जीव सुनाओ। सब जीवोंका भरम नशाओ।। अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रायदेवनकी उत्पति भाई।। कुछ संक्षेप कहों गुहराई। सब संशय तुम्हरे मिट जाई।। भरम गये जग वेद पुराना। आदि रामका का भेद न जाना।। राम राम सब जगत बखाने। आदि राम कोइ बिरला जाने।। ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।। माँ अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।। पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछेसे माया उपजाई।। माया रूप देख अति शोभा। देव निरंजन तन मन लोभा।। कामदेव धर्मराय सत्ताये। देवी को तुरतही धर खाये।। पेट से देवी करी पुकारा। साहब मेरा करो उबारा।। टेर सुनी तब हम तहाँ आये। अष्टंगी को बंद छुड़ाये।। सतलोक में कीन्हा दुराचारि, काल निरंजन दिन्हा निकारि।। माया समेत दिया भगाई, सोलह संख कोस दूरी पर आई।। अष्टंगी और काल अब दोई, मंद कर्म से गए बिगोई।। धर्मराय को हिकमत कीन्हा। नख रेखा से भगकर लीन्हा।। धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। मायाको रही तब आसा।। तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु...

गोरखनाथ जी महाराज से कबीर जी की गोष्ठी

एक समय काशी (बनारस) में शास्त्रार्थ करने के लिए (ज्ञान गोष्टी के लिए) आए। जब ज्ञान गोष्टी के लिए एकत्रित हुए तब कबीर साहेब भी अपने पूज्य गुरुदेव स्वामी रामानन्द जी के साथ पहुँचे थे। एक उच्च आसन पर रामानन्द जी बैठे उनके चरणों में बालक रूप में कबीर साहेब (पूर्ण परमात्मा) बैठे थे। गोरख नाथ जी भी एक उच्च आसन पर बैठे थे तथा अपना त्रिशूल अपने आसन के पास ही जमीन में गाड़ रखा था। गोरख नाथ जी ने कहा कि रामानन्द मेरे से चर्चा करो। उसी समय बालक रूप (पूर्ण ब्रह्म) कबीर जी ने कहा - नाथ जी पहले मेरे से चर्चा करें। पीछे मेरे गुरुदेव जी से बात करना। योगी गोरखनाथ प्रतापी, तासो तेज पृथ्वी कांपी। काशी नगर में सो पग परहीं, रामानन्द से चर्चा करहीं। चर्चा में गोरख जय पावै, कंठी तोरै तिलक छुड़ावै। सत्य कबीर शिष्य जो भयऊ, यह वृतांत सो सुनि लयऊ। गोरखनाथ के डर के मारे, वैरागी नहीं भेष सवारे। तब कबीर आज्ञा अनुसारा, वैष्णव सकल स्वरूप संवारा। सो सुधि गोरखनाथ जो पायौ, काशी नगर शीघ्र चल आयौ। रामानन्द को खबर पठाई, चर्चा करो मेरे संग आई। रामानन्द की पहली पौरी, सत्य कबीर बैठे तीस ठौरी। कह कबीर सुन गोरखनाथा, चर्चा करो ह...

शेख फरीद की अमर कहानी

एक #शेख #फरीद नाम के मुसलमान संत थे, भक्त थे। वो बचपन में काफी शरारती था। और उसकी माता जी प्रतिदिन नमाज़ करने को कहती थी, वो नहीं करता था, मानता नहीं था। वो कहता था कि मुझे अल्लाह से क्या मिलेगा? मैं क्यों करूँ नमाज़? एक दिन माँ ने कहा कि अल्लाह तुझे खजूर देगा। अब शेख फरीद जी को खजूर बहुत प्रिय थे। वो उसका मनपसंद फल था। वह कहने लगा - सचमुच। माँ ने कहा - हाँ। शेख फरीद ने कहा कि देख लो, अगर अल्लाह ने खजूर नहीं दिए तो मैं कभी नमाज़ नहीं करूँगा। माता ने कहा -अवश्य देगा बेटा। वो यह चाहती थी कि ये किसी तरह शरारत से पीछा छोड़ दे, नमाज़ तो इसे क्या करनी आएगी। और मैं अपने काम कर लिया करुँगी। बहुत उलाहने आते हैं। माता ने क्या किया कि एक चद्दर बिछाई, और कहा कि बेटा, जब तक मैं न कहूँ तब तक आँख नहीं खोलनी। और ऐसे विधि बता दी कि ऐसे लेट कर मत्था टेकना है। शेख फरीद ने कहा कि क्या कहूँ माँ ? माता ने कहा कि ये कहता रहियो कि - अल्लाह मुझे खजूर दे, अल्लाह मुझे खजूर दे। शेख फरीद यही करता रहा - अल्लाह मुझे खजूर दे। माँ अपने काम में लग गयी। उसकी माँ ने क्या किया कि थोड़े से खजूर ला कर, 4-5 खजूर एक पत्ते में लपेट ...
click