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मनुष्य जीवन में नाम दीक्षा का महत्व

मनुष्य जीवन में सतभक्ति करने के लिए 
#मानव_जीवन_में_नाम_दीक्षा_कितनी_जरूरी•••?❓👇👇

“जब तक पूर्ण गुरु का सत्संग सुनने को नहीं मिलता तब तक इस बात का अंदाजा ही नहीं लगता कि मनुष्य जीवन कितना कीमती है ।“

चाहे आप कितने भी धनी पुरुष हो, गोरखनाथ जी जैसे सिद्ध पुरुष हो, अनगिनत कलाओं के स्वामी हो,  समाज में मान-सम्मान प्राप्त शख्सीयत हो, चाहे इस पृथ्वी के राजा भी क्यों न हो, अगर गुरु दीक्षा नही ली है तो स्वर्ग में भी स्थान नहीं मिलता। इस संबंध में सुखदेव मुनि की कथा प्रमाणित है।।
                           #वाणी•••👇👇
#कबीर~गुरु बिन माला फेरते,गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन दोनों निष्फल है, चाहे पूछ लो वेद पुराण।।

किसी भी दान, धर्म, पूजा, साधना, धर्म-कर्म का कोई महत्व नहीं अगर आपके पास गुरु दीक्षा नही है तो और ऐसे प्राणी मनुष्य जन्म पाने के अधिकारी भी नही होते क्योंकि गुरु दीक्षा के बगैर देवी देवता किसी भी दान को स्वीकार्य नहीं करते। पवित्र गीता इस तथ्य को स्पष्ट करती है।
             नाम दीक्षा ना लिया हुआ मनुष्य अपने कीमती मानव जीवन को यूं ही व्यर्थ गंवा देते है और अगले जन्म में गधे कुत्तों की योनियों में अपने द्वारा किए हुए सभी पुण्य को भोगते हैं और जन्म मरण का चक्र यूं ही अन्य योनियों मे कर्म आधार पर चलता जाता है।।
            इस संबंध में पूर्ण अक्षर ब्रह्म, पूर्ण परमेश्वर हम सभी आत्माओं के जनक कबीर शाहेब कहते हैं।।
                          #वाणी•••👇👇
#कबीर~एक हरि के नाम बिना,ये राजा ऋषभ होए।
         मिट्टी लदे कुम्हार कै, घास न नीरै कोए।।

बहुत विचारणीय और गंभीर विषय है, 
कि मानव जीवन यूं ही व्यर्थ ना जाए।
            ये एक ही उदाहरण यहां इसकी महत्ता को स्पष्ट कर देता है इसलिए विनम्र निवेदन है मनुष्य जीवन पाकर नाम दीक्षा जरूर ले ताकी जन्म मरण का चक्र सदा के लिये छूट सके और आतम कल्याण हो सके।।
   क्योंकि बिना सतभक्ति के मोक्ष नहीं संभव और सुख तो हो ही नहीं सकता इस लोक में,
                जैसा कि आजकल नवरात्रों के पाखंड चल रहे...ये कहीं नहीं लिखा किसी भी धार्मिक सदग्रथ में ये बस भेड़ चाल है।।
                            #वाणी•••👇👇
जीवन चारि दिवस का मेला रे बांभन झूठा, 
     वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला।

मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजति बाहर चेला रे,,
 लड्डू भोग चढावति जनता, मूरति के ढिंग केला रे।।

पत्थर मूरति कछु न खाती, खाते बांभन चेला रे,
से जनता लूटति बांभन सारे, प्रभुजी देति न अधेला रे।

पुन्य-पाप या पुनर्जन्म का, बांभन दीन्हा खेला रे,, स्वर्ग-नरक, बैकुंठ पधारो, गुरु शिष्य या चेला रे।।

जितना दान देवे गे जैसा,वैसा निकलै तेला रे,
बांभन जाति सभी बहकावे,जन्ह तंह मचै बबेला रे।

           ’’#गुरू_बिन_मोक्ष_नहीं‘‘•••👇✅
#प्रश्न :- क्या गुरू के बिना भक्ति नहीं कर सकते?
#उत्तर :- भक्ति कर सकते हैं, परन्तु व्यर्थ प्रयत्न रहेगा।

प्रश्न :- कारण बताऐं?
उत्तर:-परमात्मा का विधान है जो सूक्ष्मवेद में कहा है:-
                        #वाणी•••👇👇
#कबीर~गुरू बिन माला फेरते,गुरू बिन देते दान,,
    गुरू बिन दोंनो निष्फल है, पूछो वेद पुराण।।

#कबीर~राम कृष्ण से कौन बड़ा,उन्हों भी गुरू कीन्ह,,
        तीन लोक के वे धनी, गुरू आगे आधीन।।

#कबीर~राम कृष्ण बड़े तिन्हूं पुर राजा,,
    तिन गुरू बन्द कीन्ह निज काजा।।

                 #भावार्थ :- गुरू धारण किए बिना यदि नाम जाप की माला फिराते हैं और दान देते हैं, वे दोनों व्यर्थ हैं। यदि आप जी को संदेह हो तो अपने वेदों तथा पुराणों में प्रमाण देखें।
                श्रीमद् भगवत गीता चारों वेदों का सारांश है।
 गीता अध्याय 2 श्लोक 7 में अर्जुन ने कहा कि हे श्री कृष्ण! मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। गीता अध्याय 4 श्लोक 3 में श्री कृष्ण जी में प्रवेश करके काल ब्रह्म ने अर्जुन से कहा कि तू मेरा भक्त है।। 
            पुराणों में प्रमाण है कि श्री रामचन्द्र जी ने ऋषि वशिष्ठ जी से नाम दीक्षा ली थी और अपने घर व राज-काज में गुरू वशिष्ठ जी की आज्ञा लेकर कार्य करते थे। श्री कृष्ण जी ने ऋषि संदीपनि जी से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया तथा श्री कृष्ण जी के आध्यात्मिक गुरू श्री दुर्वासा ऋषि जी थे।
            👉कबीर परमेश्वर जी हमें समझाना चाहते हैं कि आप जी श्री राम तथा श्री कृष्ण जी से तो किसी को बड़ा अर्थात् समर्थ नहीं मानते हो। वे तीन लोक के मालिक थे, उन्होंने भी गुरू बनाकर अपनी भक्ति की, मानव जीवन सार्थक किया।
             इससे सहज में ज्ञान हो जाना चाहिए कि अन्य व्यक्ति यदि गुरू के बिना भक्ति करता है तो कितना सही है? अर्थात् व्यर्थ है।।
             👉 गुरू के बिना देखा-देखी कही-सुनी भक्ति को लोकवेद के अनुसार भक्ति कहते हैं। लोकवेद का अर्थ है, किसी क्षेत्रा में प्रचलित भक्ति का ज्ञान जो तत्वज्ञान के विपरीत होता है। 
            लोकवेद के आधार से यह दास (संत रामपाल दास) श्री हनुमान जी, बाबा श्याम जी, श्री राम, श्री कृष्ण, श्री शिव जी तथा देवी-देवताओं की भक्ति करता था। 
           हनुमान जी की भक्ति में मंगलवार का व्रत, बुन्दी का प्रसाद बाँटना, स्वयं देशी घी का गिच चुरमा खाता था, बाबा हनुमान को डालडा वनस्पति घी से बनी बुन्दी का भोग लगाता था। हरे राम, हरे कृष्ण,कृष्ण-कृष्ण हरे-हरे का मन्त्र जाप करता था। किसी ने बता दिया कि :-👇
     ओम् नाम सबसे बड़ा, इससे बड़ा न कोय।
    ऊँ नाम का जाप करे, तो शुद्ध आत्मा होय।।
इस कारण से ओम् नाम का जाप शुरू कर दिया। 
ओम् नमो शिवायः, यह शिव का मन्त्र जाप करता था। ओम् भगवते वासुदेवायः नमः, यह विष्णु जी का जाप करता था। 
तीर्थों पर जाना, दान करना, वहाँ स्नान करना, 
यह भी लोकवेद के आधार से करने जाता था।।
            👉 जैसे घर में सुख होते थे तो मैं मानता था कि ये सब मेरी उपरोक्त भक्ति के कारण हो रहे हैं। जैसे कक्षा में पास होना, विवाह होना, पुत्र तथा पुत्रियों का जन्म होना, नौकनी लगना। ये सर्व सुख उपरोक्त साधना से ही मानता था।।
  🍀 कबीर परमेश्वर जी ने सूक्ष्म वेद में कहा है :-👇
                           #वाणी•••👇
#कबीर~पीछे लाग्या जाऊं था, मैं लोक वेद के साथ।
       रास्ते में सतगुरू मिले, दीपक दीन्हा हाथ।।
                        #भावार्थ है कि:- साधक लोकवेद अर्थात् दन्त कथा के आधार से भक्ति कर रहा था। उस शास्त्रविरूद्ध साधना के मार्ग पर चल रहा था। रास्ते में अर्थात् भक्ति मार्ग में एक दिन तत्वदर्शी सन्त मिल गए।    
              उन्होंने शास्त्राविधि अनुसार शास्त्रा प्रमाणित साधना रूपी दीपक दे दिया अर्थात् सत्य शास्त्रानुकूल साधना का ज्ञान कराया तो जीवन नष्ट होने से बच गया। सतगुरू द्वारा बताये तत्वज्ञान की रोशनी में पता चला कि मैं गलत भक्ति कर रहा था। 
           श्री मद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23,24 में कहा है कि शास्त्र विधि को त्यागकर जो साधक मनमाना आचरण करते हैं, उनको न तो सुख होता है, न सिद्धि प्राप्त होती है और न ही गति अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है अर्थात् व्यर्थ साधना है।।
             फिर गीता अध्याय 16 श्लोक 24 में कहा है कि अर्जुन! इससे तेरे लिए कृर्तव्य और अकृर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण हैं।
             जो उपरोक्त साधना यह दास (संत रामपाल दास) किया करता था तथा पूरा हिन्दू समाज कर रहा है, वह सब गीता-वेदों में वर्णित न होने से शास्त्र विरूद्ध साधना हुई जो व्यर्थ है।।
                            #वाणी•••👇👇
#कबीर~गुरू बिन काहु न पाया ज्ञाना,,
        ज्यों थोथा भुस छडे़ मूढ़ किसाना।।

#कबीर~गुरू बिन वेद पढै़ जो प्राणी,,
         समझै न सार रहे अज्ञानी।।
मनुष्य जीवन को सफल बनाने के लिए व समस्त बुराइयों से निदान पाने के लिए तथा सुखमय जीवन जीने के लिए संत रामपाल जी महाराज जी से नाम दीक्षा ग्रहण करें...
#पूर्ण_____परमात्मने_____नम:••••🛐🙏☺️☺️☺️
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अगर लिखने में कोई त्रुटि हुई हो तो परमात्मा क्षमा करें....आज के समय में भी वही परमात्मा वही भक्ति हम सभी को सुलभ एवं सहज रुप नें मौजूद है...तो इस अवसर ता लाभ उठाईये और परमात्मा स्वरूप...शतगुरु संत रामपालजी महाराज जी की शरण ग्रहण कीजिये और अपना जीवन सफल बनाएं...☺
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